

*144 वर्ष के बाद संयोग के बाद आई इस महाकुंभ में पवित्र स्नान करने का सौभाग्य मिला इसके लिए मैं अपने आप को भाग्यशाली समझता हूं : शंकर ठक्कर*
Mumbai
अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कॉन्फडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर ने बताया प्रयागराज के पवित्र संगम स्थल पर 144 वर्षों के संयोग के बाद आए इस पवित्र महाकुंभ में मुझे संगम स्नान करने का अवसर प्राप्त हुआ इसलिए मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं।
इस महाकुंभ में मुझे जप, तप, योग, धर्म, आस्था,भक्ति, परंपरा,आध्यात्म समरसता का अद्भुत महासंगम यानी की कुल मिलाकर एकता का महायज्ञ होने का प्रतीत हुआ।
13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक चले इस महाकुंभ के पवित्र वातावरण में लाखों विश्वासियों के लिए ऊर्जा से एक अविस्मरणीय अनुभव बने हर एक कदम पर श्रद्धा, उत्साह और एकता की गूंज देखने को मिली ।
महाकुंभ दुनिया का एक ऐसा अद्भुत मेला है, जहां वे संत मिलते हैं, जिन्हें संसार से कुछ नहीं चाहिए, और वे सांसारिक भी मिलते हैं, जिन्हें संसार से बहुत कुछ चाहिए।
संभवतः एकांत और मेले के विरोधात्मक भेदभाव को मिटाने के लिए ही पूर्वजों ने यह प्रथा बनाई होगी।
मेरी नजर से बहते-बहते सागर में समाना नदियों की नियति है तो
स्वयं सागर को नदियों में समाहित होना ही कुंभ है।
इस भव्य दिव्य कुंभ जहां पर आयोजित है वह पवित्र प्रयागराज एक शहर, जो पिछले डेढ़ महीने भर से जाम रहा। एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में जाना ऐसा था, जैसे एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना।दस में से नौ काम टाले जा रहे हैं थे।जब मार्केट से हरी तरकारी खरीद लाना युद्ध जीतने जैसा हो गया था, तब किसी के बीमार पड़ने पर परिवार की क्या गति हुई होगी, यह प्रयाग जाने पर यूँ ही समझा जा सकता है। हर गली में गाड़ियों की लाइन लगी हुई थी। अगली गाड़ी महाराष्ट्र की है तो उसके ठीक पीछे बंगाल की। ठेठ तमिल में पूछे गए प्रश्न का भी उत्तर दे रहे थे प्रयागी लोग, वो भी बिना समझे ही… उस शहर की हर गली में पूरा भारत उतरा हुआ है, जैसे लोटे के जल में उतर आती हैं गंगे च यमुने चैव गोदावरी नर्मदा सिंधु कावेरी।
शहर के लड़के डेढ़ महीने भर से नाते रिश्तेदारों को स्नान कराने में लगे हुए हैं थे। कल बड़ी बुआ, आज मौसी… कल बड़े पापा के दोस्त आने वाले हैं तो परसो भैया के फेसबुक फ्रेंड… वे दौड़ रहे थे, घर से संगम ,संगम से घर… कभी बाइक से, कभी पैदल… तीन किलोमीटर की यात्रा दो घण्टे में भी पूरी नहीं होती, फिर भी वे चलते रहे, दौड़ते रहे, हँसते रहे।
उस बड़े शहर की अपनी हजार दैनिक परेशानियां। हानि लाभ, जनम-मरण, दुख सुख.. शादी विवाह, पर्व त्योहार भी… वे कैसे मैनेज कर रहे होंगे ?, यह सोच कर आश्चर्य होता है। पर वे कर ही रहे थे। प्रयाग की प्रतिष्ठा मान कर, अपना दायित्व मान कर, अपना धर्म समझ कर।
इसमें कोई दो राय नहीं कि डेढ़ महीने भर से दुनिया की व्यवस्था संभालता प्रयाग थक चुका था। थकान स्पष्ट दिख रही थी। पुलिसकर्मियों के चेहरों पर, संत शिविरों के व्यवस्थापकों, कार्यकर्ताओं के चेहरों पर, यहाँ तक कि साधु-संतों के चेहरों पर… किसी शिविर में जा कर वहाँ के कार्यकर्ताओं की दिनचर्या देख ने जैसी थी , वे बीस बीस घण्टे जग रहे थे, दौड़ रहे थे, तप रहे थे। यही स्थिति प्रयाग के सामान्य जन की थी।
मैं मानता हूं कि कुछ तीर्थयात्रियों के बुरे अनुभव भी रहे होंगे। उन्हें वहाँ लूटने वाले भी मिले होंगे।बाहरी भीड़ को देख कर कुढ़ने वाले भी मिले होंगे। पर कलियुग में सभी देवता तो नहीं हो सकते न मित्र। नकारात्मक लोग भी रहेंगे ही… फिर भी! कुम्भ में प्रयाग का जो मूल स्वभाव दिखा है, वह सहयोग का है, सम्मान का है, सेवा का है।
प्रयाग के मित्रों! उस पावन तीर्थ से लौटने के बाद सबसे पहले आपको धन्यवाद देने का मन है। कुम्भ का अमृत आपके जीवन में बरसे, यह एक तीर्थयात्री का सहज आशीष है… पूरी दुनिया जिस भूमि को प्रणाम करने के लिए दौड़ पड़ी है, उसकी गोद का निवासी होने के गर्व को साधिकार धारण कीजियेगा।
पहला प्रणाम यूपी के आदरणीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को जिनके कुशल नेतृत्व में इतना भव्य दिव्य आयोजन संभव हुआ।
दूसरा प्रणाम यूपी के आयोजन से जुड़े अधिकारियों एवं कर्मचारियों को।
तीसरा प्रणाम यूपी की पुलिस को जिन्होंने पिछले डेढ़ महीने में 18 घंटे से ज्यादा समय तक इस आयोजन को सफल बनाने में अपना योगदान दिया।
चौथा वंदन सफाई एवं रेलवे कर्मचारियों को जिन्होंने बेहतरीन सेवाएं प्रदान की।
कुल मिलाकर महाकुंभ अनुभव अद्भुत और अद्वितीय था।
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